Saturday, November 5, 2011

आत्मप्रशंसा

आत्मप्रशंसा मनुष्य की मूल प्रवृत्ति है ..यह निराशा और दूसरों के द्वारा असहयोग किये जाने के समय सकारात्मक साधन के रूप में प्रयोग किये जाने पर व्यक्ति के आत्मविश्वास में वृद्धि करती है पर जब यह खुद साध्य हो जाती है तो हमारे खुद के अस्तित्व के लिए विष बनती है ,परिणामतः हम पूरे समाज के लिए घातक सिद्ध होने लगते हैं ...अतः इस औषधि का नियंत्रित प्रयोग ही लाभकारी है ..

1 comment:

Admin said...

वन्दे मातरम् ..जय हिंद http://wwwsomaijayprakashcom.blogspot.in/